Forest Fire Mitigation Measures: अब तक तीन मौतें, जानें कौन है आग के लिए जिम्मेदार

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Forest Fire Mitigation Measures

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Forest Fire Mitigation Measures: पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में नैनीताल के आसपास के जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। यह आग 72 घंटों से अधिक समय से जल रही है। आग बुझाने के प्रयास में भारतीय वायु सेना के जवानों और एमआई-17 हेलिकॉप्टरों को लगाया गया है। इस आपरेशन का नाम बम्बी बकेट दिया गया है जिसमें हेलिकॉप्टर आग बुझाने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में पानी इकट्ठा कर रहे हैं और जेट-स्प्रे कर रहे हैं। आइए जानते हैं उत्तराखंड के जंगलों की आग का राज क्या है। कौन है इसके लिए जिम्मेदार। Forest Fire Mitigation Measures कैसे काबू में पाएं हर साल की इस त्रासदी से।

जंगलों के जलने पर आई ये बड़ी रिसर्च

उत्तराखंड में जंगल की आग: कारण, नतीजे और उपचारात्मक उपाय विषय पर जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान, कोसी-कटारमल, अल्मोडा (उत्तराखंड), के जी.सी.एस. नेगी ने अपने शोध पत्र में उत्तराखंड की आग के कारणों और उपायों पर रोशनी डाली थी।

50 प्रतिशत जंगल आग के खतरे में

आग को भारत में वन घटने का एक प्रमुख कारण माना जाता है। भारतीय वन सर्वेक्षण Indian Forest Survey के अनुसार, देश में लगभग 50% वन क्षेत्र अग्नि के खतरे में है और लगभग 6% पर वार्षिक रूप से गंभीर आग लगने का खतरा है। भारत मं हर साल जंगल की आग Forest Fire लगने की लगभग 18,000 घटनाएं दर्ज की जाती हैं, जिससे लगभग 1.14 मेगाहर्ट्ज क्षेत्र प्रभावित होता है। इससे अनुमानित वार्षिक हानि लगभग रु. 4,400 मिलियन होती है। इसमें वनों से मिलने वाली सेवाएं जैसे जैव विविधता का नुकसान, कार्बन अलग करने की क्षमता, मिट्टी की उर्वरता, वनों के जल विज्ञान संबंधी कार्य आदि कार्यों का मूल्य शामिल नहीं है।

हरियाली और रास्ता nature and man

प्रकृति से खिलवाड़ हमें कहां ले जा रहा है इसका एक छोटा सा उदाहरण है जंगलों की आग। जबकि इंसान और प्रकृति एक दूसरे के पूरक हैं। ये कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मनुष्य अन्य प्राणियों की तरह प्रकृति पर पूरी तरह निर्भर है।
तकनीक और विकास की दीवार में कैद मनुष्य दम घुटती सांसें उसे प्रकृति के करीब लाती हैं। प्राकृतिक छटाएं चाहे वह नदियों का किनारा हो या हरियाली का रास्ता उसे मां के आंचल का अहसास कराता है।

Forest Fire in Uttarakhand क्या हैं कारण

अगर उत्तराखंड की आग की बात करें तो इसका एक बड़ा कारण चीड़ के पेड़ों के प्रति इंसान का मोह है। चीड़ के पेड़ अपनी राल युक्त नुकीली पत्तियों और टहनियों के कारण अत्यधिक ज्वलनशील होते हैं। क्योंकि जब इनमें रगड़ लगती है तो आग लग जाती है। इनसे जंगल में आग लगने का खतरा सर्वाधिक होता है। उत्तराखंड में, चीड़ के जंगलों में सालाना लगभग 4 लाख टन चीड़ की पत्तियां गिराई जाती हैं, जो गर्मियों के दौरान परिवेश के तापमान में वृद्धि के बाद वन तल की ज्वलनशीलता को बढ़ा देती हैं।

जंगल की आग लगने के तीन कारण

हम जंगल की आग को तीन भागों में बांट सकते हैं (i) प्राकृतिक आग, (ii) मानव निर्मित यानी जानबूझकर लगाई गई आग और (iii) अन्य कारणों से लगी आकस्मिक आग। उत्तराखंड में प्राकृतिक आग लगने की घटना दुर्लभ है। चूंकि यह Forest Fire मुख्य रूप से ऊंचे चीड़ के पेड़ों द्वारा रोकी गई बिजली से लगती है। इसके अलावा क्वार्टजाइट पत्थरों के नीचे गिरने से निकली चिंगारी भी कारण होती है। चिंगारी और बांस की टहनियों की रगड़ से लगती है आग। जो सूखे जंगल के कूड़े और घास को पकड़ लेती है। 2016 में मानसून के बाद सूखा जारी रहने और अल नीनो प्रभाव मुख्य रूप से उत्तराखंड के जंगलों को आग की चपेट में लाने के लिए जिम्मेदार रहा।

हो गया खुलासा कौन लगा रहा जंगलों में आग (Forest Fire Mitigation Measures)

अनुसंधान में यह पाया गया है कि उत्तराखंड में मानव-जनित जानबूझकर लगी आग का योगदान मानव-जनित आकस्मिक आग की तुलना में अधिक रहा है। शोध में यह बताया गया कि जंगल की आग की कुल घटनाओं में से, 63% मानव-जानबूझकर थीं, और शेष 37% आकस्मिक थीं।

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पहाड़ों के जंगलों में आग लगने के कारणों की बात करें तो अवांछित घास को हटाने और पशुओं के लिए रसीले चारे की बेहतर वृद्धि प्राप्त करने, फसल के नुकसान से बचने, जंगली जानवरों को दूर भगाने, मधुमक्खी के छत्ते को तोड़ने और ट्रैकिंग पथ साफ़ करने, भूमि अतिक्रमण की चाह में पेड़ों को हटाने के लिए मानव-जनित आग जलाई जाती है।

इनकी लापरवाही है जिम्मेदार

मानव जनित आकस्मिक आग मुख्य रूप से फसल बोने के लिए खेतों को तैयार करने के लिए खरपतवार और फसल अवशेषों को जलाने के दौरान आसपास के जंगलों में लगी आग का कारण बनी।
कई बार रोड मरम्मत, किसी राहगीर द्वारा लापरवाही से फेंकी गई सिगरेट या बीड़ी, पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और श्रमिक शिविरों में आग जलाने से निकली चिंगारी या बिजली पारेषण लाइनों से स्पार्किंग भी जंगल की आग की वजह बनती है।

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जैसा कि अध्ययनों से स्पष्ट है कि अतीत में उत्तराखंड के जंगलों में आग से कुल 9000 किमी लंबी (30, 50 और 100 फीट चौड़ी) आग की रेखाएँ बन चुकी हैं। इन्हें हर साल साफ़ करने की आवश्यकता होती है ताकि ईंधन लोडिंग और वन तल की ज्वलनशीलता कम हो।

Forest Fire Mitigation Measures
जंगल की आग को नियंत्रित करने और उससे बचने के लिए शोधकर्ताओं ने ये उपाय सुझाए हैं जिन पर ध्यन देना होगा।
जंगल की आग से लड़ने के लिए पारंपरिक तरीकों (फायर लाइन, कंट्रोल बर्निंग, काउंटर फायर, आदि) और प्रौद्योगिकी दोनों को नियोजित करने की आवश्यकता है।

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लोगों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए अग्नि संवेदनशील क्षेत्रों में उपकरणों, उपकरणों और संसाधनों को समय पर जुटाने की आवश्यकता है।
चीड़ के पेड़ों का धीरे-धीरे उन्मूलन, निचली शाखाओं की कटाई और सड़कों, ट्रैकिंग पथों और आग के प्रति संवेदनशील स्थानों पर चीड़ के पेड़ों की जगह अग्नि अनुकूलित और प्रतिरोधी प्रजातियों के वृक्ष लगाये जाने चाहिए।
इसके अलावा, आग के मौसम से पहले फुटपाथों, मोटर सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर नियंत्रित आग जलाने की आवश्यकता होती है।

ऐसे करें चीड़ का औद्योगिक उपयोग

चीड़ के वृक्ष से निकलने वाली पाइन सुई बायोमास (जैविक संसाधन) का औद्योगिक उपयोग किया जाना चाहिए। इसका बिजली उत्पादन, तेल निकालने, जैव-ब्रिकेटिंग, हस्तशिल्प, फैंसी वस्तुओं और कागज बनाने में उपयोग हो सकता है। इसके अलावा हार्डबोर्ड और पैकिंग सामग्री के निर्माण आदि के लिए। इससे रोजगार पैदा होगा। और स्थानीय लोगों के लिए आय बढ़ेगी। जिला पिथोरागढ़ में बेरीनाग में अवनि बायो-एनर्जी संगठन गैसीफायर में पाइन सुइयों का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहा है। और प्रति वर्ष 10,800 kWh बिजली का उत्पादन करता है। इस बिजली को सीधे मौजूदा ग्रिड में डाला जाता है, जिससे क्षेत्र को विश्वसनीय और स्वच्छ ऊर्जा मिलती है।

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